
क्यों आतंकवाद की भीषण अग्नि समाज में भड़क रही है ?
क्यों मानव को दुर्दैत्य प्रवृत्ति में समेट रही है ?
आतंकवाद ने समाज को घेरा है चहुँ ओर से
मन विकलता में तड़प उठता है इस क्षोभ से,
क्यों मानव हृदय में प्यार, मोहब्बत, अमन की
अंतिम सिसकियाँ चल रही है ?
क्यों दिलों में इतनी नफरत भड़क रही है ?
आखिर क्यों ???
आतंक की दावाग्नि में मानवता घिर रही है
झुलस कर दिलो से संवेदनाएं मिट रही है
क्यों बदले की आग जहां में दहक गई है ?
सबके मन में नफरत की फसल पक गयी है
क्या मानवता मिट गयी है दिलों के छोर से ?
आखिर क्यों ???
इंसान बना इंसान के खून का प्यासा है
जानवर से अधिक मनुष्य ही अभागा है
क्यों हर बंदगी आज तबाह हो गयी ?
उस नियति की शख्सियत फना हो गयी
क्यों जिंदगी मासूमों के लिए गुनाह हो गयी ?
आखिर क्यों ???
खुद के दुख से ज्यादा परसुख से जलता है
गम के आंसू दे औरों को दुष्कर्म पर हंसता है
क्या उच्छृंखल मानव की मानवता बच पाएगी ?
या ईश्वरीय कृति की अस्मिता मिट जाएगी
क्यों हारी बाजी को जीतने का दंभ भरता है ?
आखिर क्यों ???
गम के आंसू दे औरों को दुष्कर्म पर हंसता है
क्या उच्छृंखल मानव की मानवता बच पाएगी ?
या ईश्वरीय कृति की अस्मिता मिट जाएगी
क्यों हारी बाजी को जीतने का दंभ भरता है ?
आखिर क्यों ???
विचार कर देखें यदि तो समस्याएं स्वयं नहीं
बोये हैं बीज हमने तो काटेगा क्या और कोई
क्यों मजबूर किया उन हाथों को खेलने खून की होली ?
अब तो मिटाए दाग और रहें समान भाव से हमजोली
क्यों न विश्व वसुधा को दें शांति अहिंसा की खोली ?
आखिर क्यों ???
क्यों मजबूर किया उन हाथों को खेलने खून की होली ?
अब तो मिटाए दाग और रहें समान भाव से हमजोली
क्यों न विश्व वसुधा को दें शांति अहिंसा की खोली ?
आखिर क्यों ???
