Monday, 26 May 2014

लायक बेटियां

बेटियां कैसी भी हो हमेशा लायक होती है
घर में रहे तो मां का हाथ बटाए
जब निकले घर से बाहर तो बेटा बन जाए
‍पिता के साथ जिम्‍मेदारियां निभाए
भाई बहनों के लिए अभिभावक बन जाए
मुश्किल का सामना बहादुरी से कर जाए
फिर समाज की नजरों में ये क्‍यों चुभ जाए
जन्‍म से लेकर बडे होने तक
कितनी परीक्षाएं सह जाए
फिर मां बाप की ढाल बन खडी हो जाए
जीवन का हर क्षण कसौटी पर कसे
फिर समाज की नजरों में अबला बन जाए
आज से नहीं यह कहानी बहुत पुरानी है
आज बेटियां केवल ब्‍याहने के लिए नहीं
ये समाज में आ रही क्रांति की चिनगारी है।।।।।।।।। 

Monday, 14 May 2012

मां बिन अधूरी....मेरी कहानी



गर्मी की धूप में वो मेरी छांव है,
जिंदगी के सफर की साथी अविराम है।
सर्दी की रातों में गर्माहट का एहसास है,
घर से हूं मीलों दूर फिर भी मां मेरे आसपास है।
मुश्किलों में बन जाती चट्टान है,
खुशियों में दिल का अनकहा अरमान है।


जिंदगी का पहला कदम मां के साथ बढ़ाया है,
अंधेरी गलियों में मां ने रास्ता दिखाया है।
कई बार गम के बादलों ने जब आकर मुझे घेरा है,
मेरी मां ने बनकर सूरज जिंदगी में कर दिया उजेरा है।
मेरे सपने पूरे करने की खातिर मां रात रात भर जागती है,
सारा दर्द छिपाकर दिल में हरदम ही मुस्काती है।
मैं सागर की हूं मछली वो मेरा दाना पानी है,
मां के साथ जुडा हर लम्हा वरना मेरी जिंदगी अधूरी कहानी है।

Tuesday, 27 September 2011

आतंक की भीषण अग्नि


क्यों आतंकवाद की भीषण अग्नि समाज में भड़क रही है ?
क्यों मानव को दुर्दैत्य प्रवृत्ति में समेट रही है ?
            आतंकवाद ने समाज को घेरा है चहुँ ओर से
            मन विकलता में तड़प उठता है इस क्षोभ से,
            क्यों मानव हृदय में प्यार, मोहब्बत, अमन की
            अंतिम सिसकियाँ चल रही है ?
            क्यों दिलों में इतनी नफरत भड़क रही है ?
            आखिर क्यों ???
आतंक की दावाग्नि में मानवता घिर रही है
झुलस कर दिलो से संवेदनाएं मिट रही है
क्यों बदले की आग जहां में दहक गई है ?
सबके मन में नफरत की फसल पक गयी है
क्या मानवता मिट गयी है दिलों के छोर से ?
आखिर क्यों ???

           इंसान बना इंसान के खून का प्यासा है
           जानवर से अधिक मनुष्य ही अभागा है
           क्यों हर बंदगी आज तबाह हो गयी ?
           उस नियति की शख्सियत फना हो गयी
           क्यों जिंदगी मासूमों के लिए गुनाह हो गयी ?
           आखिर क्यों ???

खुद के दुख से ज्यादा परसुख से जलता है
गम के आंसू दे औरों को दुष्कर्म पर हंसता है
क्या उच्छृंखल मानव की मानवता बच पाएगी ?
या ईश्वरीय कृति की अस्मिता मिट जाएगी
क्यों हारी बाजी को जीतने का दंभ भरता है ?
आखिर क्यों ???
         विचार कर देखें यदि तो समस्याएं स्वयं नहीं
         बोये हैं बीज हमने तो काटेगा क्या और कोई
         क्यों मजबूर किया उन हाथों को खेलने खून की होली ?
         अब तो मिटाए दाग और रहें समान भाव से हमजोली
         क्यों न विश्व वसुधा को दें शांति अहिंसा की खोली ?
         आखिर क्यों ???   

Tuesday, 20 September 2011

वो लोग हैं यारो



वे लोग बडे काफिर हैं यारो
जे मांगते हैं, पेट भरने दो जून की रोटी
कह दो उनसे खा लें, सरकार के वादों की गोटी।
वो लोग बडे ज़ालिम हैं यारो
कहते इन हाथों को काम नही, छायी है बेकारी
कह दो उनसे करले साफ नजरें, चला दें रोजगार की आरी।
वो लोग बडे अहले नज़र है यारो
कहते ज़िदगी खूबसूरत है, जीयो मानकर आखिरी पारी
कह दो जाकर उनसे तोड़ दे भ्रम, देखें मेरे भारत की आबादी।
वो लोग बडे फनकार हैं यारो
जो खेलते हैं, जिंदगी के अक्स पर अपनों ही से बाजी
कह दो उनसे, हर बार ये नादानी खुशगवार नहीं होती।
वो लोग बडे हालात-ए-तज़ुरबात हैं यारो
जो डालते सच के पैरों में घुंघरू करते झूठ की ऊंची सवारी
कह दो उनसे ढल गयी अमावस, आ रही पूर्णिमा की चांदनी उजियारी।

Monday, 5 September 2011

गांधी जी को सुनो जरा्



गांधी के सपनों का भारत

एक दिन जा रही थी सड़क पर
अपने में उलझी थोड़ी सी जागी थोड़ी सी सोयी।
तभी अचानक आँखे चमकी
चौराहे पर खड़ी गांधी की मूर्ति की पलकें झपकी।
खुद पे हुआ न यकीन लगा सपना देख रही हूं
पास गयी ता देखा गलत नहीं सोच रही हूँ।
सचमुच अहिंसा के पुजारी खडे़ थे
मगर कुछ सकुचाए हिचकिचाए हैरान
मैंने पूछा चौराहे पर कैसे खड़े हैं श्रीमान !
बोले मन नहीं लगा स्वर्ग में
इसलिए आकर खड़ा हुआ हूं यहां।
अगले पल देखा-
एक नेताजी चले आ रहे थे पूरे जोश में
मैंने नेताजी से कहा चलिए गांधी से मिलाती हूं।
वे बोले बेवकूफ किसी और को बनाना  
व्यस्त हूं मैं कहकर होने लगे रवाना।
अधिक आग्रह पर चल दिए मेरे साथ
चौराहे पर पहुंचे तो गांधी नहीं थे लाठी के साथ।
नेताजी चीखे चिल्लाए और एक झापड़ हमपर जड़ दिया
कहा मैं ही मिला जो इस झंझट मं रगड़ दिया।
तभी गांधी प्रकट हुए
मेरी भृकुटी के भाव आवेशित हुए।
कहा बहुत मजा आया मुझे पिटवाकर
बिना लंच इतना भोजन कराकर।
गांधी बोले मैंने गधा नहीं
घोड़ा लाने को कहा था।
मैंने कहा अब आपका देश इन गधों के हवाले है
जो पहनते तो हैं श्वेत वस्त्र पर दिलों के काले हैं।
हाथो में लेकर कमल पीछे से पंजा दिखाते हैं
साइकिल और हाथी पर बैठकर जनता को लालटेन दिखाते हैं।
गांधी जी का सिर चकराया
शायद उनको चक्कर आया।      
बोले मैं गलत जगह पर आया हूं
मेरा भारत यहाँ नहीं कहीं पीछे छोड़ आया हूं।
अब मेरा इस देश को क्या काम
गर देश को गांधी की नीतियों से नहीं काम !!!!

Wednesday, 24 August 2011

गुनेहगार


सुबह नही ंतो शाम कभी तो वह रोया होगा,
निज कृत्य पर खूब सिर पकड धोया होगा।
जुबां के लब्ज से ही नहीं ऐ दोस्तों
तकदीर लिखने वाला दिल-ए-आरजू से भी रोया होगा।

पत्रकार


हर अंधेरे को रोशनी में लाते हैं
पत्रकार,
अँधियारी दुनिया में उजाला बनकर
आते हैं पत्रकार।
बुराई में अच्छाई को खोजना है
मकसद,
अपराधियों को सन्मुख लाते हैं
पत्रकार।
समाज के जो रक्षक बन गए हैं
भक्षक,
उन सबको सबक सिखलाते हैं
पत्रकार।
हर गरीब के ये बनते हैं
मसीहा,
हर बेगुनाह को इंसाफ दिलाते हैं
पत्रकार।
जो न कर सके दुनिया के धनी लोग
अब तक,
ऐसे अनोखे कार्य करते हैं,
पत्रकार।
समाज के लोगों की सुनता नहीं कोई
उनको सुनते,
निर्धन त्रस्त लोगांे की जुबां बनते हैं
पत्रकार।
सारे गरीब लोगों की दुआएँ इनके
साथ हैं,
सारा समाज करता है इनको
नमस्कार।
छल कपट की भावना होती नहीं
है इनमें,
देश और समाज की आवाज है
पत्रकार।
हर पेशे से समर्पित सेवा भाव
है इनका,
पत्रकारिता है चुनौती इसलिए बनूंगी मैं
पत्रकार।।।।